टूटी हुई निब

टूटी हुई निब से
कांपती उंगलीओं से
जो भी लिखना, संभाल के रखना !

रेत पे रखा पत्थर,
धँस जाता है, रेत के धँसने पर !
पत्थर का वजूद, रेत का हो के रह जाता है !

जब मिलेंगे तो गुज़रे हुए दौर को याद करेंगे,
जब हम पत्थर बन के रेत पे, रेत के खिलाफ, रेत की कहानी लिखते थे !

मुसाफिर

मैं माझी हुं, किनारों से डरता हुं
मैं मुसाफिर हुं, ठिकानों से डरता हुं

खोने को कुछ

वो जो पक्के रंगो वाली गाँठें थीं,
वो भी खुल गयीं !
उगते सूरज की लालियां जो घुली थी रातों में,
वो भी धूल गयीं !
एक दूजे की मुस्कुराहटो में जो बसा ली थी हंसी,
वो भी भूल गयीं !

हवा जो कान के पास से गुज़र जाती है,
अब तुम्हारी बातें नहीं करती !
सुनहरी शामों में खामोशियाँ मिलती हैं,
पर कोई कहानी नहीं !

ना होना एक बात है और खो देना एक बात है,
और दोनों ने ही मुझे आज़माया है !

सोचता हूं के ये बदक़िस्मती है या खुशकिस्मती
के मेरे पास खोने को कुछ भी नहीं !
सच्च ! कुछ भी नहीं !!


When you move from having everything, to have left nothing to lose...

पैरों के तले

उमरों के पन्ने रखे रहते हैं दरखतों पे,
पतझड़े हिसाब लगातीं पत्ता पत्ता !
हवाएं उड़ा ले जाती हैं कुछ किस्से,
जिनके ठूंठ में भरे रहेंगे सब राज़ !
कुछ भीग के मिट्टी बन गये होंगे,
बरसात में और कुछ स्याही !


बाकी सब, तुम्हारे पैरों के तले खड खड़ाहट !!

किनारे

लहरों सी आती जाती सांसों में बुलबुलों सी मोहब्बतें,
और किनारे पे चट्टान से खड़े शिकवे !
जाने कितने ही सीप यादों के भर लिए मैने अपनी जेबों में,
और मुठ्ठिओं में रेत भर ली किस्मतों की !

ओ पीची, ज़िंदगी कैसी है !!

सब वैसे

मेरे यहां,
तुम्हारी कुछ झपकियां रखी हुई हैं,
और कुछ गीली मिट्टी की खुश्बू !
इक किताब है जिसके आधे पन्ने पुराने और आधे अनछूहे हैं !
शीशे पे तुम्हारे गीले बालों के कुछ छींटें भी बचे हैं !
तकिये वाली अपनी कुछ लड़ाई भी बाकी है !


मैने संभाल के रखा है सब वैसे ही जैसा तुम छोड़ के गयी थी !
बस सिवाए अपने !!

जो रह गया

खूँटी पे अपना हेअर-बैंड टाँग गयी...
तीखी सी हवा में झनक पायल की आवाज़ छोड़ गयी...
डायरी का सफ़ा जिसमे बुकमार्क छोड़ गयी...
शीशे पे टेस्ट की हुई लिपस्टिक की लकीर छोड़ गयी...
चाए की प्याली में ठंडी फूंक छोड़ गयी...
मेरे बिस्तर की सिलवटों में अपनी करवटें छोड़ गयी...

मैने सबके साथ जीना सीख लिया !

बस मेरे काँधे पे इक बाल छोड़ गयी थीं,
मेरी रातों को तो बस वही चुभता रहा है !

अंदर

भीगी तो मेरी रूह है पर मैं जिस्म से ज़हर निचोड़ता हूं !
मैं ऐसा ही हूं, पता नहीं क्यों,
जब अंदर देखना होता है तो खिड़की से बाहर देखता हूं !!

ठिकाने

सुना है राहें मुश्किल होती हैं मोहब्बत की,
मोहब्बतों ने वैसे भी कौन सा ठिकानों की चाह रखी है !

चोरी

घास पे पड़ी पंखुड़ी को उठा के टटोलना,
और झुकी नज़रों और बंद होठों से बेबाक इश्क़ की गवाही !

किसी की धड़कनें चुराना भी एक फन्न होता होगा !!