नशा

जब मैं बहुत सी इधर-उधर की बातें करने लगता हूं
तो चाए बना लेता हूं !
कभी चाए अच्छी ना बने तो विस्की से काम चला लेता हूं !
नशा फिर भी यही सोच के होता है के जैसे मैं तुम्हारे हाथों की बनाई चाए पी रहा हूं...

ठिकाना

उम्र से वर्ष कटते रहते हैं,
जैसे परतें कटती हैं, उस पत्थर से जो झरने के ठीक नीचे ठिकाना बना लेता है !
उसी पत्थर की मानिंद मैं भी सोचता हूं के कभी कुछ बदलेगा,
मगर नहीं बदलता, सब वैसा ही रहता है !
झरने का टूट के गिरना पत्थर पे
और तुम्हारा टूट के बिखरना मेरी स्मृति में !

ठिकाना था नहीं, मैने बना लिया है !!

हदें

मेरे दिनों के फरक सब ले गया कोई,
मेरी रातों में अपना कुछ रख गया कोई !

मेरी बाहों की हदों में आ के, मेरी हदें लांघ गया कोई !!

फरक

अपने आप से कुछ ऐसे मिल पाता हूं अब,
आईने के आगे दरवाज़ा लगा हो जैसे !
मैं खुद से ही उखड़ गया हूं,
सरहद पे तार लगा के, दो हिस्सों में फरक डाल गया हो कोई जैसे !

मैं पूरा नहीं रहा,
मेरा कुछ बाकी रह गया हो जैसे !

ख़तम होने के बाद

उसने मोहब्बत का हवाला दिया था,
‘मोहब्बत नहीं है’ बोलने के बाद !
शिखर पे कल रात की बर्फ पे जैसे धीमी आँच सुलगती रही हो !

थोड़ा नफ़रतों को जगह दे देना,
मोहब्बत ख़तम होने के बाद !
सिखर दोपहर जैसे झुलसती बालू पे बारिश की बूँद उबलती रही हो !!

रंग

काली सलेट पर चाक से लिखूं
या कोरे काग़ज़ पे काली स्याही से !
लफ़्ज़ों में ज़िंदगी भर देने का हुनर सीख रहा हूं अभी तो !

मेरी लिखतों में रंग मत ढूंडना !!

राख

अकसर वो भीगी शामों की बालकोनी में,
सिगरेट सुलगा के खुद को जलाता रहता !
और खोई सी रातों के घाट पर,
अपनी अस्थिआं ले के बह जाता उसी ख्वाब में !!

उसके दिन, राख में से ज़िंदा होने की कोशिश भर थे !!

ठिकाना


ਰਾਵੀ ਤੇ ਚਨਾਬ ਦੀ ਯਾਰੀ

ਮੈਂ ਸਵੇਰ ਦੀ ਠੰਡੀ ਤਰੇਲ ਤੇ ਤੁੰ ਅੱਤ ਦੀ ਸਰਦੀ ਚ ਕੋਸੀ ਕੋਸੀ ਧੁੱਪ !
ਤੁੰ ਹਨੇਰਿਆਂ ਚ ਪੱਤੇਆਂ ਦੀ ਖੜਕ ਤੇ ਮੈਂ ਗੁਮ੍ਮ ਚ ਧਰਤੀ ਦੀ ਚੁੱਪ !
ਤੂ ਜੇਠ ਦੀ ਤੱਤੀ ਵਾ ਚ ਘੜੇ ਦਾ ਪਾਣੀ, ਮੈਂ ਕੜਕੇ ਦੀ ਧੁੰਦ ਚ ਚਾਹ ਕਰਾਰੀ !

ਆਪਾਂ ਵਗਦੇ ਰਹੀਏ ਬਣ ਧਾਰਾਂ, ਜਿਵੇਂ ਰਾਵੀ ਤੇ ਚਨਾਬ ਦੀ ਯਾਰੀ !!

इक रात

रात पिघली चाँद की कटोरी में !
सितारों ने ली करवटें हवाओं की चादर तले !
घड़ी की सुईओं ने रिड़का लम्हों को !
जुगनूओं ने अंगीठी जलाई पानिओं में !

फिर इक रात रोज़ की तरह पूरी हो गयी !

फिर इक रोज़, मैं पूरा का पूरा, अधूरा रह गया !!