उधारी

किष्तों में भरपाई मुश्किल है,
कभी वस्सल का सबब बने तो अस्सल ले जाना !
रोज़ की सिसकियों से बेहतर है,
एक दिन अपने से दूर और खुद से मरासिम कर जाना !!
यह आँसुओं की उधारी यूँ तो बड़ी महँगी है !!!

धुँधला अक्स


रात के अंधेरे में भी,
जब एक हल्की सी लौ बाकी रहती है,
तुम थोड़ी “chubby” सी क्यों ना हो,
उस अध-जली रोशनी में,
खिड़की के काँच के पीछे,
तुम हसीं लगती हो !
तुम्हारा इक धुँधला सा अक्स ही बन पाता है,
मेरे ज़हन में,
जब बादल छुपा लेते हैं, आधा अक्स चाँद का,
तो मुझे तुम हसीं लगती हो !

फिर उतर जाती है धीरे धीरे तो मुझे लगता है,
के शायद वो पागलपन था जो नशे ने किया था !
और मैं सोच में पड़ जाता हूँ के “सच्ची मोहब्बत” किसे कहते हैं?
शायद शराब में अब वो कैफियत नहीं बची जो मुझे गुमराह कर सके !!

अतीत

लिखना चाहती हूँ अपने आँसुओ से तेरे आँसुओ तक का,
लिख देती हूँ अपने आँसुओ से तेरी हँसी तक का सफ़र !
ये रास्ते भी बड़े बेवफा से होते हैं,
एक बार छूट जाएं तो फिर नये ढूँडने पड़ते हैं !
और तुम सोचते हो के मैं अतीत में जी रही थी !!

तेरे आँसू

यह आँसू बहते हैं इस उम्मीद में
के एक दिन तेरे आँसुओं का सबब बनेंगे !
दरियाओं को बहा देता है सावन
समंदर में बाढ़ ला दे कोई ऐसी शिद्दत कहाँ !!

आख़िरी बार

समय भी ताक में रहता है बीतने की,
जो फ़रवरी के महीने दिन कम मिलते हैं !
इक जुदाई ही दायम है मेरे नसीब में,
वरना महीने तो और भी आएँगे !

यह मोहब्बत चीज़ ही ऐसी है,
आख़िरी बार होती है, पहली बार नहीं !!

पलकें

कुछ दिल का दर्द था जो रख दिया था
तुम्हारी पलकों पे मैने !
झपकी तो फिर उठी नहीं वो पलकें
जो उस बोझ तले दब गयीं थीं !!

परिंदे

परिंदो की शिकायत है के,
गीत नहीं सुनता मैं उनके आज कल !
कैसे समझाऊं के,
खामोशियाँ गैर लगती हैं मुझे अब,
और तन्हाई का सॅब्बब नहीं बनता !

खुद में ही किसी को पा गया हूँ !!

ਤੇਰੀਆਂ ਪੁਗਾਈਆ

ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਲਾ ਲਈਆਂ ਯਾਰੀਆਂ ਨੀ,
ਕੁਝ ਮਿਠੀਆ ਤੇ ਬਹੁਤੀਆਂ ਫੋਕੀਆਂ !
ਭਾਵੇਂ ਸਾਨੂ ਜਾਂਚ ਨਹੀ ਸੀ ਨਿਭੌਣ ਦੀ,
ਤੇਰੀਆਂ ਸੁੱਕੀਆਂ ਵੀ ਅਸਾਂ ਹੰਜੂਆ ਚ ਸੀ ਸੋਕੀਆਂ !!

ਗੁੱਸੇ-ਗਿਲੇ ਤਾਂ ਹੰਡਾਅ ਲੇ ਸੀ ਕਿਸੇ ਤਰੀਕੇ,
ਤੇਰੀਆਂ ਪੁਗਾਈਆ ਝੱਲੀਆਂ ਨੇ ਬੜੇ ਔਖੇਆਂ !
ਸੱਚ ਕਿਹਾ ਬਾਈ, ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੀ ਪੈਂਡਾ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦਾ,
ਇਸ਼ਕੇ ਦੀ ਵਾਟ ਨੀ ਨਿਭਦੀ ਸੋਖੇਆਂ !!

कैनवस

कैनवस पे पैंटिंग करते बहुत देखे थे
पर एक रंगरेज़ देखा जो रंग निचोड़
कैनवसें बनाता रहता था !
आख़िरी पड़ाव के लिए जैसे
चादरें इकठ्ठी कर रहा हो !
हर लिबास पे सफेद रंग यूँ पोत गया वो
के हर आईने में एक सी हो गई हूं !
मुर्दे ही मोल आंक सकेंगे मेरा
के अधूरा होना कोई ज़िंदा ज़िस्म कैसे जान सकता है?

फुलकारी

मां ने सर्दी की रातों में जाग जाग
एक फुलकारी बुनी थी !
जिसके एक कोने में
चुपके से मैने तुम्हारा नाम लिख दिया था !
पर अब सोचती हूं
के उसपे किसी ओर का नाम मढ़ दूं !
मोल देना है उन सपनों का
जो मां ने नही देखे, इस फुलकारी के लिए !
तुम्हारे नाम की तो मैने एक कोरी चादर संभाल रखी है !