सुबह का भूला

मैं राह तकती हूँ जुगनूओं के सो जाने का,
तुम ने तो सितारे तोड़ सुलगा लिया था अपनी बैल-गाड़ी का लैंप !
और छोड़ गये थे पीछे एक मध्म सी रोशनी
जो अब भी सुलग रही है वरांडे के दरवाज़े पे !
किल्कारी सी मार खिल-खिला उठती है नदी
जब सूरज सर पे आता है और मैं धार बन बहती रहती हूँ दिन भर !
दिन ढले नदी के किनारे बरगद के पेड़ के नीचे,
कोई गुनगुना रहा होगा वही जो तुम गुनगुनाते थे !
और मुकम्मल हो जाता है सफ़र पन्छिओ का !
सुबह का भूला ना भी आए तो शाम कहाँ रुकती है,
किसी के इंतज़ार में !!

रेत

और उस दिन एक लड़की बोली के, यूं एक टक मत देखा करो, अच्छा नहीं लगता !!
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|| रेत ||
तेरा ख्वाब आ के नींद से जगा जाता है
अतीत में से कोई लोरी ढूंढ, खुद को सुनाता रहता हूँ !
कोई होड़ लगी है तुझे मुकम्मल करने की
मैं तुझको पैमाना बना, हर शख्स को मापता रहता हूँ !
मेरी मुफ़लिसी ही मेरा जनून है
जहां मुठी भर मिलती हो, चुराता रहता हूँ
रेत फिस्सलती जाती है मुठी में से
मैं ओर ज़ोर से दबाता रहता हूँ !!

मृगतृष्णा

एक कहानी जो “on the rocks” पे शुरू होती है
स्मृति की गोद में बैठी दौड़ती रहती है मेरे ज़हन में !
मैं समझ नही पाता इसका अंत कहाँ है
और हर रात एक सी क्यों है !!

मील का पत्थर

कुछ उलझ सी गयी हैं अब यादें
तुम्हारी ज़ुल्फों सी !
उंगलिओं से सुलझाने की कोशिश करता हूं
सर-सरा जाती है अतीत की फ़िज़ा जब !
और काग़ज़ पे कालिख हो रह जाती हैं
उलझी हुई गुथिआं अतीत की !
मैं भले ना मानूं पर पता है
काग़ज़ पे छाप पड़ी है तुम्हारी ज़ुल्फों की !
पर मिथ्या सी हो चली है अब हर छाप
जो पड़ी है अतीत के रास्तों पे !

मोजों में रख रखे हैं काँच के टुकड़े मैने
आज कल रास्ते खुद से चुभते नहीं हैं पावं में !
मुझे समझ नहीं आता के ये रास्ते
किताबों से क्यों नहीं होते !
पड़ाव मिलते हैं पूरे करने को एक बार में
और मैं बार बार एक ही सफ़ा खोल लेता हूं !
जिस सफे पे उस मील-पत्थर की कविता लिखी हुई है
जिस पर ख्वाहिश नाम का शब्द कुरेदा हुआ था !

मैं मील के पत्थरों को गिनता हूँ
के ज़िंदगी का सफ़र बहुत लंबा हो चला है !
कोई हमसफ़र मिले तो मौत तक का सफ़र आसां हो जाए !!

चेहरे

रोज़ शहर भर के चेहरे टटोलता हूँ
कुछ ढूंढता हूँ वो मिलता क्यूँ नहीं !
यूँ तो उस दिन आँखों में छुपा लिया था
पर अब दिखता तू क्यूँ नहीं !!

बीड़ा

और यूँ ही कभी भूल जाते थे दोनो खुद को
जब हो जाते थे स्वार्थी !

कई कई सालों तक
गूंगी उंगलिओं से टटोलते रहते वो शब्द
और पलकें करती रहती ज़ुबां की रीस

अब तो
मैं उंगली घुमा देता हूँ शराब के ग्लास में
और पलकें पोंछ देती हैं ज़ख़्मों की टीस

मैं चुप हूँ के कहने का बीड़ा तुम्हारा है इस बार !!

हादसा

ना तो गुलाब से कोई होंठ देखे
ना मोतीओं सी कोई हँसी
ना ही रसीले गीत लिखे
ना प्रीत की कोई धुन बजी !

पेड़ से हरे पत्ते भी यूँ झड़े, सूखे पत्तों की तरह
के जैसे हादसा हो गया हो कोई !!
हां, हादसा ही तो था !!!

रात

यह रात बैठी है दरवाज़े पे टकटकी लगाए!
किसी के इंतज़ार में नहीं,
पर किसी की तन्हाई पे कुण्डी लगाए !!

खामोश सी सोच को बर्फ के टुकड़ों पर रखे
सिरहाने तले कुछ जगी आँखों के ख्वाब रखे
उलझी है किसी कश-म-कश में !
ऐसी ही किसी रात मोहब्बत का जन्म हुआ था,
आँसुओं में भीगी आँखों के साथ !!

और मैं नतीजे पर पहुँचता हूँ के
ऐसा या वैसा होना सब ख्याल ही हैं !
वैसा होता तो भी क्या होता,
रात तो आख़िर रात होती है !!


और फिर रात भी रोआन्सा होकर बोली
के तुम भी तो तुम ही हो !!
और मुझे याद आया के कुछ खो गया है...

डूबता सूरज

यूँ तो बस डूबते सूरज की हल्की सी लौ होती है,
पर लगता है के,
चाहत बाकी होगी ज़रूर कहीं पे !
मुझे धुँधला सा ही सही, पर दिखता ज़रूर है !!

कहानी

कहानियाँ भी अजीब होती हैं !
कोई दो पल में सिमट जाती है,
तो कोई दो शब्दों में !

यूँ सदिओं इंतज़ार करते हैं वो पल,
के कोई टेबल-लेम्प में पूरी रात जागेगा !
और शब्द मिलते हैं लाइब्रेरी की अंतिम शेल्फ पे,
कोने वाली किताब के आख़िरी सफे पे, बुकमार्क के पीछे छुपे हुए !

मैं ढूंड रहा हूं उन दो शब्दों के आख़िरी अक्षर को !
कोई चुरा के ले गया है उसको,
अपनी डायरी की कहानी पूरी करने के लिए !

आज भी ऐसी डायरियां रद्दी के भाव बिका करती हैं !!
और राज़ छुपे रह जाते हैं कबाड़ी की दुकान में !!