सच्च

बाकी सब झूठ है, फीका है, बेरंग है,
सच सिर्फ़ इतना जो उसने खाँचो में भरा था, अपने दिल के कोनों के !
जैसे आकाश का आसमानी रंग झूठा, मगर उदास काले बादल सच्चे !!

थमे लम्हे

यूं आज पहली बार हुआ के तेरी आंखों का चांद अलसाया सा,
करवटें लेने लगा बरसों की मेरी आंखों की जगी रातों में !
आज बांट लेते हैं चांदनी आधी आधी,
और इस लम्हे के बाद कहीं छुपा लेंगे जेबों में अगली तारीख तक !

फिर किसी रात दोनो आध जोड़ के सज़ा लेंगे आने वाली सब रातें !!

खरीद

जो खरीदा था,
या जो नहीं बेचा था,
इस दुनिया से परे !
कुछ बचा होगा, कुछ तो बचा होगा !!

बंटवारा

सारा अधूरापन लिए हुए अपने आँसुओं में,
पोंछ दिया तुमने, जो था तेरे मेरे बीच...
मेरा सारा जहां...
जिसमे आधे तुम आधा मैं...
.
सोचो के बंटवारा पहेले से लिखा था तकदिरों में

वो रात

रोशनीओं से अलहदा चांद भी भटका था,
कभी बादलों के पीछे,
चेहरा छुपाए !
उस लम्हे में कुछ अधूरा नहीं था,
मैं और तुम पूरे इक दूसरे से !!

मोम

ये दिल आईने सा है, इसे मोम बना लेना !
फिर बस पिघलेगा मगर टूटेगा नहीं
बाहर की परछाईओं को अंदर की तपिश से जला देना !!

आस

मोहब्बत के पेड़ ऊंचे होते हैं !
उनकी शाखाएँ तो नहीं होतीं,
मगर जड़ें दूर दूर तक फैलती हैं, ज़िंदगी में धंसी !
बहरहाल, ज़िंदगी की कहानी इस आस में के,
कभी उस पेड़ से गुल्मोहर के फूल झड़ेंगे !!

सुबह

वो हर बार सपने पे उंगली रख देती थी,
मैं हर बार करवट ले लेता था !
तब जगा जाता था,
सुनहरी रोटी पे चांदी सा मख्खन,
या फिर लोहे के चमच में चांदी सी खीर !

अब बस ख्वाबों में चुभ जाती है सुबह !!

नन्हीं सी बातें

तेरा मेरे बालों में गालों को रगड़ जाना,
या मेरा कंधे पे हाथ रखते रखते गालों पे हाथ रख जाना !
तेरा चलते चलते कलाई से कलाई सरका जाना,
या फिर मेरा गले लगते लगते बाहों में लिपट जाना ! 

जो सब नन्हीं सी बातें होतीं हैं, वो सब मोहब्बत होतीं हैं !!

गुच्छा

वो गुल्मोहर के पेड़ के नीचे ढान्स लगाए मिली थी,
जैसे उस गुल्मोहर का ही कोई गुच्छा ज़मीं पे गिरा हो !
और वैसी की वैसी ही दूर छूट गयी !
फिर उसको किसी दिन देखा,
उसकी नयी ज़िंदगी के पहचान-पत्र के साथ !


लगा के सब फूल सूख गये,
मगर गुच्छा अभी भी बंधा हो किसी डोरी से !!