one-way

गैर से अपने तक का रास्ता इस कदर लंबा था,
के चलते चलते कदम भूल गये के...
one-way ही है, वापिस ना लौट पाएँगे !

कभी कोई कोशिश

कभी शब्दों से खरोच के हाथ की लकीरें बदलने की कोशिश करता है कोई
जब हाथों से ज़्यादा माथे पर लकीरें पाता है कोई !


कभी राह चलते हुओं पर भी प्यार लुटाने की कोशिश करता है कोई
जब आँचल में इतना प्यार बचा रह जाता है, छलकता पाता है कोई !


कभी बादल की ही छाओं में दो घड़ी आँख लगाने की कोशिश करता है कोई
जब घर पहुँचने के लिए थके हुए पैरों से इनकार पाता है कोई !


कभी नीम छोड़ आँसुओं  का लेप ज़ख़्मों पे लगाने की कोशिश करता है कोई
जब आँसुओं के सामने नीम को फीका सा पाता है कोई !


कभी अपने ही कंधे पर सर रख के रोने की कोशिश करता है कोई
जब लंगड़े आँसू किसी सहारे की टोह में पाता है कोई !


कभी बारहवीं मंज़िल पे बने अपने ही घर से दूर जाने की कोशिश करता है कोई
जब गिरने का नहीं कूद जाने का डर मन में पाता है कोई !


कभी इस चीज़ से तो कभी उस चीज़ से अपने ही प्यार को तोलने की कोशिश करता है कोई
जब बेवफ़ाई का भार कैसे बढ़ गया, समझ नहीं पाता है कोई...
बेवफ़ाई का भार कैसे बढ़ गया, समझ नहीं पाता है कोई...
समझ नहीं पाता है कोई...

बस एक ही कांधा

अजीब जद्दो जहद है ये ऩफा-नुकसान की !
आज चार काँधे मिले हैं मुझको
कभी एक ही हुआ करता था, सर रख के रोने का सहारा था !!

करवट

सुबह उठा तो काका ने बिस्तर की सिलवटें सीधी कर दी के रात की करवटें दिखे नहीं !
वो रात आज भी याद है जब मैं करवट लेता था और तू छिल जाती थी !!
कौन सीधा करेगा तेरे बदन के शिकनों को, जो आज भी उस रात की कहानी दोहराते हैं

नज़दीकी

सोचती ही  रही तुम, थोड़ा कम सोच लेती !
करीब तो आई ही थी, थोड़ा ओर आ जाती !!

नीली स्याही

ज़ख़्मों से शब्द रिसते रहे मेरे, डॉक्टर ने नीली स्याही डाल दी थी
दर्द अब भी बाकी है
पर अब पता नहीं लगता खून कौन सा है और स्याह शब्द कौन से हैं !

कलर-ब्लाइंड

बहुत कुछ लिखता हूँ काग़ज़ पे आज कल
पर स्याही सूखते ही सिलवटों से भरा काग़ज़ रह जाता है, शब्द नहीं मिलते !
कलर-ब्लाइंड को शायद स्याही और आंसूओं के रंग भी धोखा दे जाते हैं !!

सिलाई

निशान पड़ गया है कंधे पर जहाँ तूने सर रखा था !
हर रात रगड़ रगड़ कर धोता हूँ रंगे पानी से !!
नासमझ, सिलाई नहीं निकलती, दाग तो निकल जाते हैं रगड़ने से !!

ज़िन्दगी का पन्ना

वो एक बाल तेरी ज़ुल्फो से झड़ कर मेरे होठों पर रह गया था
अभी तक संभाल के रखा था मैने किताब के पन्नों के बीच !
एक पन्ने के बीच जहाँ ज़िंदगी का ज़िकर था
कल रात आँधी आई थी, बाल तो उड़ गया पर निशान छोड़ गया उसी पन्ने पे !!

मेरी नज़म

यह दिल्लगी भी खूब है मौला, रोज़ इक नज़म मेरे गम में नहाती है !
वो सुनती तो है, पर आँसू किसी और के नाम के बहाती है !!