मुश्किल

इतना मुश्किल था नहीं, उसे भूल जाना !
यूं तो इतना मुश्किल था नहीं उसका मेरी यादों में जगह भी रख लेना !!

वक़्त का टुकड़ा

जिस वक़्त से तुमने आख़िरी बार दहलीज़ लाँघी थी,
घड़ी की सुइयाँ 12.10 के उस अटपटे वक़्त पे रुक गयी !
आज बहुत महीनों बाद इक शख्स ने,
तुम्हारे इसी घर में कदम रखे,
तो घड़ी की सुइयाँ वहीं से चलने लगी,
जैसे के घर को तुम्हारी बदल मिल गयी हो !


समय तो फिर से चल निकला,
बस वो महीने एक बेमाना सा वक़्त का टुकड़ा हो रह गये !

समय बदल जाता है मगर अक्सर पैबंद रह जाते है,
वैसे नंगे वक़्त के टुकड़ों पे !!

तुम

ज़हीन सी उस बच्ची के लिए,
बूढ़ी माई के बाल अच्छे या बुरे नहीं थे,
उसमे कुछ पाना या खोना, जीतना या हारना नहीं था,
उसके लिए बूढ़ी माई के बाल का उसके पास होना बस काफ़ी था !
इसी लिए अप्पा को उस दिन वो समझा ना पाई थी के कैसे लगे वो उसको !
क्योंके उस नन्हे से मन में काबिलियत नहीं होती,
मोहब्बत को शब्दों के हेर फेर में डालने की !


जैसे के मुझमे भी नहीं थी,
यारा, मेरे लिए तुम बस तुम थी !!

तकरीबन तकरीबन

उसे लगता है मोहब्बत करना तकरीबन तकरीबन आता है उसको; जैसा के तकरीबन सभी ही को आता है । पर जब भी वो किसी को टूट के मोहब्बत करना चाहता तो साली ज़िन्दगी आड़े आ जाती है। कभी महत्वाकांक्षाएं, तो कभी इच्छाएं, तो कभी कोई डर या फिर झिझक! वो अभिमन्यु की ही तरह मोहब्बत के चक्रव्यूह में घुस तो जाता है पर इसे हल करके आगे कैसे बढ़े, समझ नहीं आता। उसकी ही तरह पता नहीं तकरीबन तकरीबन हम सभी फेल क्यों हो जाते हैं इस सरल से काम में!

यारा, मैं सोचता हूँ अगर ये ज़िन्दगी ना होती तो शायद हम मोहब्बत तो कम से कम सही से कर पाते। इसी लिए तो शायद सब आशिक़ मौत के बाद वाले किसी जहां में जा के ही अपना इश्क़ परवान कर पाते हैं; चाहे किसी को भी ले लो हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल या कोई ओर...

जिन्दगीआं तो शायद मिलती हैं सिर्फ़ आग़ाज़ को, अंजाम के लिए बने हैं दूसरे जहाँ।

मियाद

तुमसे अच्छी तो भला रात ठहरी, सवेरे के इंतज़ार की मियाद तो तै है...

रात

सूरज सर चढ़ते ही ज़िन्दगी से लड़ाई शुरू हो जाती है, और उधर चाँद सर पे आ के मिला देता है ज़िन्दगी से फिर से । इस समय को रात की जवानी कहूं या ढलती उम्र कहूं ! आसान सवाल भी कभी कभी कितना उलझा जाते हैं चंचल मन को...
रात बाकी है कुछ, कुछ बीत गयी; मगर गुफ्तगूं पूरी बाकी। कुछ जवाब सवालों की टोह में तो कुछ सवाल जवाबों की टोह में ।

सब सवाल ढलती उम्र के और जवाब जवां अभी...

धार

उंगलिओं को काटने के लिए तलवार ज़रूरी नहीं होती,
तीखे काग़ज़ भी घाव कर जाते हैं !

कुछ लड़ाईओं में ज़रूरत,
खून से ज़्यादा स्याही की होती है !

क़लम की धार तेज़ कर लेना,
जंग आज कल तलवारों से नहीं,
दूसरे रंग की स्याहीओं से होती है !!

इंतज़ार

इंतज़ार की कोई लंबाई तय नहीं होती !
इक बेल की तरह बढ़ता जाता है,
जब तक के जड़ से काट ना दो !!

कभी कभी इंतज़ार बरगद की तरह,
पूरी ज़िंदगी में फैल जाता है !
और गाड़ देता है अपनी जड़ें हर पहलू में !!

मौसमों से लड़ाई

कैंटीन में बैठे बैठे बेंच पे तुम्हारा नाम लिखा था,
और पीपल के एक जर्द पत्ते से ढँक दिया था, जब तुम आई !
चाए पीते पीते तुमने कहा था,
जल्द ही पतझढ़ के बाद पीपल पे नयी कोंपलें और नये सुरख पत्ते आएंगे,
जिनकी खुश्बू तुम्हे गीली मिट्टी की खुश्बू से भी ज़्यादा प्यारी है !


मुझे पक्का पता तो नहीं पर मान लेता हूं के,
आज भी अकेले में किसी का इंतज़ार करते हुए,
कॉफी पीते पीते तुम भी अपने नाखूनों से नैपकिन पे मेरा नाम कुरेदती होगी !


ज़्यादा कुछ नहीं बदला,
बस पीपल के सुरख पत्ते हरे हो गये हैं, मौसमों से लड़ते लड़ते !!

बहाना

"चलोगी मेरे साथ?", उस अभागे ने बस इतना ही पूछा था| और उसने जवाब देने में कुछ पल खर्च कर दिए और जवाब दिया भी नहीं; मगर पूछा, "कहां?"
इतना काफ़ी होता है कहीं भी ना जाने के बहाने के लिए...

गर चल दिए होते तो कहीं ना कहीं तो पहुंच ही जाते...