इंतज़ार

कुछ ले लिए थे जो उधार
किशतों में चुकाता रहता हूं वो लम्हे !
सूद तो निभ जाता है,
असल में बाकी हैं सब लम्हे !

जिए हैं बार बार मैने तन्हाई में
वस्सल की रात के वो कुछ लम्हे !
और ये भी सोचा है के शायद
वो रात ही थी कुछ लम्हे !

कसम से, मैने गिने हैं सितारे सभी कहकशां के,
कहीं ज़्यादा हैं उनसे भी
मेरे इंतज़ारों के लम्हे !

हवा का रुख़

कितनी शब जला हूं मैं आदतन
ज़फ़ा की मज़ार पे बेसबब मगर !
पत्थर पे निशां ओर कितना गहरा होगा
हवा का रुख़ तै करता है दिए की उमर !!

हिस्सा

नमक होता है समंदर में जैसे
तुम ज़िंदगी का हिस्सा बन जाओ इस तरह !
ढाल दो मुझे अपनी खुश्बू में ऐसे
पहली बारिश में जैसे रेत बन जाए गीली मिट्टी की तरह !
कुछ नहीं है इसके बाद
मत जाओ और थम जाओ इस लम्हे की तरह !!

वादा खिलाफी

इशक पे लिखा अभी तलक मिटाया नहीं,
ये भी क्या कम इतफ़ाकी है !
बोल तो मेरी गज़ल में भी हैं,
मुझे तेरी खामोशी काफ़ी है !
तेरे होठों का चुप चाप रहना,
फिर आखों का सब कह देना,
ये भी क्या वादा खिलाफी है !
के तुम महबूब हो, दुश्मन नहीं !!

neat

इक याद छटपटाती रहती है गले में
जो कर देती है किसी भी मद को dilute !
इक ठंडी सांस घुलती रहती है जुबां पे
जो रखती है ज़हन को chilled !
साथी बना तो देता है एक peg मेरी खातिर
पर पूछता है के क्यों पीते हो तुम neat !!

आगाज़

मैं तो कब का गुज़र गया होता
शायद थोड़ा इंतज़ार ओर बाकी है !
किश्तो में मुकम्मल होती इस ज़िंदगी की
शायद कुछ आज़माइश ओर बाकी है !
इक लम्हा ख़तम हुआ है
दूसरे का आगाज़ अभी बाकी है !

मिठास

रावी को बना चाशनी
उडेल ली चाँद की कड़ाही में !
सहरां की रेत को बना शक्कर
बिखरा दी मैने आसमाँ में !
सितारों को उधेड़ बना ली जलेबी
चमकीले रंग की !

तू ज़रा घूमा दे अपनी उंगली इनमे
और बना दे मीठा !!

नाकाफ़ी

यूँ तो काफ़ी होती है प्यार की एक निगाह !
मगर वो अकसर सोचती है के
क्यों खुद प्यार नाकाफ़ी होता है किसी के लिए कभी कभी !

नज़ारा-ए-हाल

हैरत नहीं,
आवाम-ए-फरेब पे !
के जो दुल्हन विलखती हुई विदा होगी,
अभी उसे लेने को जश्न चला आ रहा है !!
अचंभे में तो हूं मैं,
अपने ही नज़ारा-ए-हाल पे !
के आगे आगे मैं नाच रहा हूँ,
पीछे पीछे मेरा जनाज़ा चला आ रहा है !!

है हमें जाना कहाँ, चले हैं कहाँ को हम

गणतंत्र होने का अर्थ सिर्फ़ एक संविधान का लेखा पन्नों में लिख लेना नहीं है | मेरी नज़रों में इसका अर्थ है "बिना किसी के अधिकार की अवेहलना किए राष्ट्र निर्माण के लिए लोगों का स्व: शक्ति संपन्न होना"| लोगों की सशक्ति ही इस शब्द को सार्थक करती है|
अगर स्वतंत्रता अधिकार है तो गणतंत्रता उत्तरदायित्व है और इस से बड़ा और महान उत्तरदायित्व शायद ही कोई ओर हो |

पर इस गणतंत्र दिवस पे जब आपके संविधान का दरबान "राष्ट्रपति" ही राजनीतिक तौर पे पक्षपाती हो और भारत वर्ष के लोगों को अपने वार्षिक सम्भोधन में अपने ही देश के एक राजनीतिक दल पर कीचड़ उछाले तो मेरे मन में सिर्फ़ एक सवाल उठता है:
"है हमें जाना कहाँ, चले हैं कहाँ को हम"

पर मेरा गणतंत्रता में विश्वास अभी भी है क्यों के भारत के लोग अभी भी "ज़िंदा" हैं !
इस गणतंत्र दिवस पे मुझसे शुभ कामनाएं नहीं, थोड़ा विश्वास ले लीजिए !