पतझड़

आओ बेवजह चलें...जिस रास्ते पे सूखी सांसें गिरती हैं किनारे के दरखतों से...
पतझड़ शरमा जाए इस बार निगाहों की बरसात से...

इतफ़ाकन

इतफाक जिस रोज़ इक लंबा सफ़र तै कर,
मेरी गोद में आ गिरा था,
उस रोज़ तुम्हारी उंगलियाँ खेल रहीं थी,
मेरी ज़ुल्फों की उलझन से !

इतफ़ाकन उस दिन पूरा हुआ वो,
जो अधूरा था बचपन से !
इतफ़ाकन तब दिल भी दुर्बल था,
सहारा मिला तेरी धड़कन से !

इतफ़ाकन तेरा सीना भी झुका,
मेरे आँसुओं के वज़न से !!

बददुआ

उसने बददुआ दे दी था, बिछड़ते वक़्त,
के तुम्हे ना मिलेगा चैन कहीं, कितना भी ढूंढना !
अपने एक दिन के आँसुओं के बदले !

अब मुझे जगी रातें फ़िकरे कसती हैं,
काश तुमने भी बददुआ दी होती उसे, दुआ की जगह !


बता यारा, घाटे का सौदा किसका रहा?

परिभाषा

तुम भी आना वहां जहां कुछ ओर ना होगा,
इक प्रेम की परिभाषा के सिवा !
हम रोज़ परिभाषाएं बदलते रहेंगे,
यारा,  पर प्रेम अमर रहेगा !!

मैं चला

कहानी लिखने को चला था,
मैं इक दास्तान बना गया !
इक किरदार नक्काश रहा था,
मैं इक ज़िंदगी निभा गया !

कुद्रतन उठा नींद से तो,
मैं इक ख्वाब जगा गया !
खुली आँखों से ख्वाब देखा तो,
मैं सबको आईना दिखा गया !

मंज़िल ढ़ूंढने निकला था,
मैं सब रास्ते भुला गया !
मैं चला था अकेले,
पीछे इक कारवां चला गया !

मैं तन्हाई में रोया,
गम की महफिलें सज़ा गया !
अपने काँधे से बोझ उतारा तो,
चार का बोझ बढ़ा गया !


मुझे छू के गया था बस,
वो मुझे मोहब्बत सीखा गया !!

सरलता

इक दिन मुझमे से ही आवाज़ आई थी के मोहब्बत को मान लेना ही मोहब्बत है | अब मैने ये भी महसूस किया है के किसी से भरोसा उठ जाने का मतलब उस में से विश्वास उठ जाना नहीं होता |
इतना कहना काफ़ी होगा के मोहब्बत होती सरल है पर निभती बड़ी कठिन है |

बदक़िस्मती

सुना है के लोग अकेले आते हैं, अकेले जाते हैं इस दुनिया से !
इक बदक़िस्मती, यारा, देखो,
के कुछ जीते भी अकेले हैं !!

के वो खत धुल गया था पिछली बारिश में,
जिसमे तुम्हारा साथ था !!

मुआमले

कभी ऐसा भी होगा जब हौड़ ना होगी खुद को छुपाने की,
तुम अपने सारे मुआमले निपटा लेना मुझसे तब,
और सब शिकवे भुलाते रहना !

अभी मुझे थोड़ी ओर मोहलत दे दो खुद को बचाने की,
फिर मैं बना रहूँगा नाचते हुए बंदर की तरह ,
तुम चाबी घूमाते रहना !!

अभिमान

एक लकड़हारा था, बहुत ग़रीब, बेहद बदसूरत और बेहिसाब खुशहाल !

पेट भरने के लिए रोज़ जॅंगल में लकड़ियाँ काटता था, आत्मा की प्यास बुझाने के लिए बंसी बजाता था और पंछीओं के साथ गीत गाता था | धन के नाम पे एक कुल्हाड़ी और एक बंसी के सिवा कुछ ना था, पर दौलत के नाम पे दुनिया भर का संतोष था |

एक दिन लकड़हारा जॅंगल में एक परी को देखता है| उसका मन किया के इतनी खूबसूरत परी को बाहों में भर ले या कहीं भगा के ले जाए इस जॅंगल से भी कहीं दूर | वो कदम बढ़ाता है, पर ठिठक जाता है | वो परी एक पिंजरे में क़ैद होती है, एक बेहद सुंदर मोर के पिंजरे में |

लकड़हारा परी से जा के पूछता है के वो पिंजरे में क्यों बंद है | परी बताती है, “मोर ने मुझे एक दानव से खरीदा था और अब मैं उसकी जागीर हूँ | मोर मुझे आज़ाद तो कर देगा पर तुम्हे उसे मेरे बदले कुछ बेशक़ीमती देना होगा |” लकड़हारा बोलता है, “मेरे पास तो ऐसा कुछ नहीं है, पर ये कुल्हाड़ी और ये बंसी है, मेरी सारी धन-दौलत यही है |” मोर बोलता है किसी की पूरी की पूरी धन-दौलत से बेशक़ीमती और क्या हो सकता है, मैं तुम्हारी दौलत ले लूँगा परी के बदले |

परी पिंजरे से बाहर आती है तो लकड़हारा अपने मन की बात परी को बोलता है तो परी हंस देती है | बोलती है, "मैं परी हूँ और तुम लकड़हारे !!" खुद की पहचान तो बता ही देती है परी, साथ साथ उसकी भी पहचान बता देती है | और ये बोल के वो उड़ जाती है | अकेली !

उस दिन के बाद फिर कभी जॅंगल में बंसी नहीं बजी |
बस, कहानी ख़तम!

परी और लकड़हरे का आगे कुछ नहीं होता |
पर मेरा अनुमान है के ना वो लकड़हारा था ना वो परी थी, ना वो ग़रीब था ना वो किसी दूसरी दुनिया की, ना वो बदसूरत था ना वो खूबसूरत |

वो दोनो अभिमान थे अपने अपने होने के !!

दूरी

आज की रात बड़ी दूर चलेगी !
नींद लौट जाएगी दबे पावं, ख़्वाबों को माचिस की डिब्बी में छुपा |
मैं ज़ाया करता रहूंगा सब ख्वाब, सिगरेट के धुएं के छल्ले बना ||

आज की रात बड़ी दूर चलेगी !
मौत दे जाएगी सबूत अपनी आमद का, उम्र को पैमाने में छुपा |
ज़िंदगी टटोलती रहेगी सबब अपने होने का, शराब को सिरहाना बना ||

यारा, आज की रात बड़ी दूर चलेगी !