दरवाज़ा

एक बार ज़िंदगी ने उसके दरवाज़े पे खट-खटाया भी था,
पर फिर कदम पीछे हटा लिए थे, उसी आवेग से जैसे बढ़ाए थे !

फनकार

सिगरेट के छल्ले उड़ाती तन्हाईयां,
विस्की के छोटे छोटे घूंट लेती बेचैनियाँ,
चाए की चुस्कियां लेती सर्दियाँ,
और छत्त पे सितारों के नीचे लेटी गर्मियाँ,
अक्सर दे जाती हैं जनम ना जाने कितने फनकारों को !

और
जाने कितने फनकार मरते हैं ऊँचे ए.सी. ओफिसों में लॅपटॉप्स के सामने !!

शामिल

वो जो संदूकड़ी में बात पड़ी है अभी तलक,
उसे निकाल के खंगाल लेना अपने आँसुओं में,
और सुनहरी धूप में सूखा लेना !
उस भीग के सूखी हुई बात को,
फुलकारी बना ओढ़ लेना इस रात,
और कर लेना शामिल मुझे भी कहीं,
पार्ट 2 में !!

आज़ाद

मैं किनारों में बंधा दरिया हूं,
मुझे बे-किनारा कैसे करोगे !

तुम समंदर हो, मसिहा नहीं,
तुम मुझे आज़ाद कैसे करोगे !!

इतिहास

मैने सब लिखा है फिर मिटाने को,
यूँ ही बस इश्क़ है, कोई वजह नहीं !
इतिहास बनाने को वजह और नतीजे चाहिए होते हैं !
इश्क़ नहीं !!

सिलसिले

वो दीवार तोड़ गया, मगर नीहें डाल गया !
मैने ग्लास तोड़ दिया फिर, मगर सिलसिले जोड़ गया !!

कविताएं

मुझे रब्ब नहीं मिलता कहीं अपनी कविताओं में,
वो सदाएं ढूंढ लेते हैं !
मुझे दर्द नहीं मिलता कहीं अपनी कविताओं में,
वो दर्द के सबब ढूंढ लेते हैं !
मुझे शब्द नहीं मिलते कहीं अपनी कविताओं में,
वो अर्थ ढूंढ लेते हैं !

देर आना

कितने ख्वाब उधेड़े हैं मैने, दो चार सिक्कों के बदले,
और ख्वाब सिलने वाले उस दर्जी ने शहर बदल लिया !

यूं भी कभी कभी देर आना दरुस्सत आना तो नहीं होता !

खाली ग्लास

उसकी फिल्टर कॉफी और मेरी अदरकी चाए की,
महकें मिल जाएं,
जैसे दरिया और समंदर मिल जाएं,
के बिखर गए हों गले मिल के !

पीची, देखना, बस फिर किस्से ही मिलेंगे खाली ग्लासों में !!

जोकर

ज़िंदगी अक्सर रखती है हुकुम का इक्का अपने पास तुम्हारे जोकर का जवाब में...
इक ग़लत खेला जोकर चड़ा जाता है उम्र भर की बाज़ी...