मजबूरी

उससे सुनती थी किस्से, कहानियां और कविताएं,
अब कालिख हुए दिल से स्याही धोया करती है !
कश्ती एक, बाहों के घाट पे किनारे लगती थी,
अब आँसुओं के समंदर में खुद को डुबोया करती है !

एक एक रात वस्सल की जोड़ी थी उसने मिल्कियत,
अब एक एक शब हिजर को खोया करती है !
कोयल ने अंडे तो दे दिए कौए के घोंसले में,
पर रोज़ शाम दूर से उन्हें देख रोया करती है !

दुपट्टे पे सजाती थी वो अरमानों के सितारे,
अब सांझ के ख्यालों से चुन्नी भिगोया करती है !
किताब जो खुद उठ के चिराग जला जाती थी,
आज अपनी ही जिल्द में छुप, तन्हा सोया करती है !

आईनों से उलझाती रही वो चेहरे की चांदनी,
अब झील के पानी में चांद बोया करती है !
कली, रात से निचोड़ लेती थी चाशनी, ग़ज़ल बुनने के लिए,
वो कांटों में शबनम को अब पिरोया करती है !


ये ना कह, यारा, वो है ही नहीं,
वो आज भी तेरे गीतों में समोया करती है !

बंधन

तुम मिलोगी भी, तो यक़ीनन फिर विछुड़ जाओगे !
ये ज़िंदगी फिलहाल इस कशमकश से बंधी है,
कोई मिल गया था, या कोई खो गया है !

आधी अधूरी

रख के हाथ मेरे रुखसार पे,
तुमने दुआ थी के मुझे भी कोई मिलेगा !
यारा, मोहब्बत नहीं तो दुआ ही पूरी की होती,
के अब, कोई मिलता भी है तो मेरा बनता नहीं है !!

लड़ाई

कोई रोता रहे कई लम्हे, मेरा चेहरा अपने आँचल में लिए,
और कह दे के मैं सारी की सारी हूँ तुम्हारी !
हाए, ज़िंदगी मुकम्मल होना भी बड़ा आसान है !!

पर, मालूम नहीं के वो लटें इतनी शरारती हैं,
या मेरी साँसों की लड़ाई है कोई बड़ी बड़ी आखों से !
जो ज़िंदगी उस बेमाने से मोड़ पे आ के रह जाती ही अधूरी !!

संक्षेप

सेंक दे अपने हाथों से इक निवाला,
भूख के लिए !
और इक कतरा रख लेना अपनी आखों में,
प्यास के लिए !

क्या जो मैने कहा, वो तुमने सुना !
देखना कहीं ज़िंदगी छोटी ना रह जाए,
मुलाकात के लिए !!

मुखौटा

मैं ढूंडता हूं हंसी अपनी,
दूसरों के चेहरे में !
और बन जाता हूं वैसा ही,
जैसे के सामने वाले की निगाहें देखती हैं !

सच ये है के,
हंसी एक 'extinct species' हो गयी है !

और मैं रह गया हूँ बन के इक मुखौटा !!

ਵਕ਼ਤ

ਕਿੱਕਰਾਂ ਦੇ ਸੱਕ ਲਭੇ ਸਨ,
ਮੈਂ ਲਾਚਿਆਂ ਮੰਨ ਕੇ ਚੁਗ ਲੇ ਨੇ !
ਉਸ ਕੰਜਰੀ ਬਣ ਬਣ ਔੜ ਹੰਢਾਈਆਂ,
ਹੁਣ ਵਕ਼ਤ ਹੂਰਾਂ ਦੇ ਪੁੱਗ ਲੇ ਨੇ !!

मध्यांतर

ये मध्यांतर है,
यहां कहानी तोड़ देती है अपनी रफ़्तार !
आभास होता है मझधार का !
और अस्तित्व होता है सिर्फ़ इंतज़ार का !!

सांझ

तुमसे मिलूं तो तेरे साथ,
दुनिया से जुदा होने का जी करता है !
तेरी नज़दीकी मिले तो ले के कहीं,
दूर चले जाने का जी करता है !

मैं आ गया दूर मगर, यारा, तुम अधरस्ते कहां छूट गये !
छोड़ गये जो चुन्नी का सिरा मेरे हाथों में,
उसे ओड़ के अब यहीं सो जाने का जी करता है !!


परिंदे चले वापिस मुकामों पे, मुझे वापिसी का रास्ता भी तो नहीं पता...

शाम करारी

मेरी अदरक के स्वाद वाली चाए में,
तू शहद वाली अपनी उंगली घुमा दे !
इतना काफ़ी है इस लम्हे के लिए के शाम पहेले से करारी है !!