यकीं

यकीं मानिए मुझे हैरत होती है हर बार जब मेरी कलम से अल्फ़ाज़ निकल के कुछ अर्थपूरन साकार कर पाते हैं| हैरत इस लिए के 30 पतझड़ गुज़रने के बाद भी जिसे प्रेम नहीं मिला वो प्रेम का दर्शन लिखने से नहीं कतराता| शायद विडंबना इसी की परिभाषा है…
बहरहाल बालकनी के उस तरफ बारिश है और इस तरफ मैं प्यासा हूं,
आज कुछ रंगा पानी भी काम आ जाएगा शायद कलम के साथ साथ…

मौसम

तुम्हारा वो तिन बिना टस से मस हुए,
आज भी तुम्हारे काँधे पे मेरा इंतज़ार किया करता है !
अपने उस काँधे से दुपट्टा मत सरकने देना,
तूफ़ानों के मौसम में अभी देर है !!

बिन-मौसम बरसात

तुम निकालो अपनी सूरमे-दानी से घटा,
मैं भी जेबें टटोलता हूं अपनी !
मेरे रुमाल में तुम्हारे हिस्से की बरसात छुपी थी,
आज निचोड़ के ज़रा बिन-मौसम बरसात का लेते हैं मज़ा !!

इंतज़ार

इंतज़ार गर ख़तम हो जाए तो इंतज़ार कहां रहता है,
इंतज़ार की फ़ितरत है बने रहना !

आज की रात बंधी है कच्ची डोरी से,
दुआ करो के पतंग कटे ना !
मैं उड़ना चाहता हूं बेसबब ख्वाबों के बादल के परे,
इंतज़ार के अंधेरे में रात भर !!

माप

मैनें मापा था कई बार वो लम्हा के कितना मुख़्तसर था,
जब तुमने मुझे पहली और आख़िरी बार अपनी बड़ी बड़ी आंखों से चाहा था !
और अब सोचता हूं के बे-कराँ था,
जो मेरी सोच में बस के रह गया है हमेशा के लिए !!

बस अब आके इक बार माथे को चूम देना,
और ख़तम कर देना सब कुछ !
वरना वो लम्हा रह जाएगा इस असीमित खला में,
क़ैद हो के, मेरे अरमानों की तरह !!

सांसें

अभी शामों का कारवां बाकी है काफ़ी...
मेरी ज़िंदगी में गमों का सिलसिला बाकी है काफ़ी...
के सांसें चलती रहें...

किस्सा

काश के मुझे याद करें सब मेरे जाने के बाद ऐसे,
इक था वो, इक थी वो और एक “है” मोहब्बत उनके दरमियां !!
बहरहाल, किस्सा जुटाने में लगे हैं,
ये गुज़रते लम्हे, लेते हैं रात भर दिलों के ब्यान !!

दहलीज

मेरे पांव बांधे रखी है इक सोच, के शायद,
कोई तुम्हे मुझसे भी ज़्यादा मोहब्बत करता है !
तुम्हे भी पता लगेगा के कितनी दर्द-शुदा है,
ज़िंदगी जब खुद-ब-खुद लांघेगी वो दहलीज !!

सवेरा

कुछ दिए सिसकियां भरते हैं
और मान लेते हैं तकदीर अपनी,
बुझी बाती के धुएं को !
कुछ दिए रोते रह जाते हैं
और जलते हैं पूरी रात,
इंतज़ार में रोशनी के !!

सवेरा हो भी तो भला सूरज निकलेगा या नहीं, क्या पता !!

किताब

लाईब्रेरी में बैठी वो धीरे से बोली,
आदमी की पहचान उसकी किताबों से होती है !
कैसे समझाऊं के मेरी गुम हैं सारी किताबें,
मेरी पहचान तो बस कोरे काग़ज़ों से होती है !!