पर्दे

पर्दों के पीछे अतीत के दरीचों में,
एक गुल्दान रख के गयी थी तुम !
उसके फूल सब मुरझा गये हैं,
पर अब भी बाकी हैं कुछ कांटें !!
 

फूल अब डायरी में सियाहीओं से लड़ते हैं,
और कांटे बेताब रहते हैं ख़रोंचने को !
वक़्त ने मरहम लगा के छुपा दिया उपर से,
पर नीचे बाकी हैं सब झरीटें !!


पर्दों को अपनी जगह रहने दो,
यारा, बाहर यादों का घना अंधेरा है, अंदर आ जाएगा !!

छननी

तुमने बुन लिए हैं नये रिश्ते,
मैं अभी तलक सिल रहा हूं पुरानी क़तरनें !
सितारों ने भर ली है कटोरी आज फिर चाँदनी से,
और छीन लिया है चाँद मेरी आखों से !
तुम अपनी आखों में प्रेम मत रखना,
रखना बस इक पहचान नये रिश्ते की,
और बना लेना मेरी कतरनों को अपनी छननी !!
देर से ही सही, चाँद आएगा ज़रूर !!

प्र्यतन

प्रेम एक मंझा हुआ खिलाड़ी है, आज फिर से पैंतरा चल गया और मेरी मृगतृष्णा अब भी वैसे ही है, इसी लिए तो हाथ में फिर से कांच का ग्लास आ गया |
बाहर धूम धड़ाके की आवाज़ें आ रही हैं और लोग अपनी बदी जलाने का प्र्यतन कर रहे हैं |
मैं अपनी नेकी ढूंड रहा हूं, उसी पहेले और आख़िरी प्रेम-पत्र में…
प्र्यतन करना अच्छी बात है |

हिमाकत

समंदर को ज़रा पलक झपकने तो दो,
मैं मीठी नदीओं को खारी लहरों से निकाल लूंगा !
अभी तो एक रंग-ए-मंज़र देखा है आपने,
ज़रा हमें जानिए तो सही, मैं आपकी रूहों को अपना बना लूंगा !

प्रेम पत्र

दिल प्रेम-पत्र को किराए का मकान बना रहता है,
उसी पुरानी संदूकची में, जिसका ताला गुम हो गया था !
हर शाम यादें मकान-मालिक की हक़ारत नाक पे ले,
मेरा दरवाज़ा खटखटाती हैं !
मैं रोज़ पायल की एक कढ़ी बतौर किराया गिरवी रख देती हूँ !
रोज़ दो आहें बतौर सूद भी ले जाती हैं, यादें ! ज़बरदस्ती !

काश! के उस संदूकची का ताला नहीं बलकि चाबी गुम हो जाती,
या वो आख़िरी नहीं पहला प्रेम-पत्र होता !!

नया इज़हार

कितना आसां होता है किसी का किसी को ठुकरा देना,
नाहक ही वो रोज़ लड़ता है नये इज़हार से !
के मेरा हक़ सिर्फ़ अपने जुनून पे है, सुकून पे नहीं,
सुकून मिलेगा जब तो मुक़द्दर के अख्तियार से !!

आवारगी

"रुक जा, यार" बस इतनी सी दरखास्त कर पाया था तब !
अब भटकता रहता है दिल,
मंज़िलों और राहों में फरक जाने बिना !
आवारगी बड़ी शानदार चीज़ है !!

प्यास

सोचता हूं के आग को प्यास लग जाए तो,
कौन सा पानी अपनी सिफ्त बदल लेता है !
बात अलग है के पानी प्यास नहीं आग के वजूद को मिटा देता है !
मगर फिर प्यास भी कौन सा किसी को पूछ के लगती है !

कांच के इक ग्लास में रोज़ इकठी करता हूं,
1-3 भाग में आग और पानी,
और बुझा लेता हूं प्यास जो लगी नहीं थी,
लगाई थी, किसी आग के वजूद को मिटाने की खातिर !!

हत्या

चुप्पी की धार से तीखा उपेक्षा का खंजर,
भोंक दिया था मासूम सी ज़िद्द के सीने में !
और निकल गयी थी सारी नफ़रत छींटों में
मोहब्बत के लाल रंगों में रंगी !
उसी नफ़रत सने खंजर से आए दिन मैं करता रहता हूं,
मोहब्बत का खून जन्म लेने से पहेले ही !!

इक कुड़ी जिसदा नाम मोहब्बत है गुम है...
शिव को तो मिली नहीं और मैं जन्म लेने नहीं देता...

"सीरियल किल्लर" होना भी शायद ज़रूरी था...

सुनहरा लिफ़ाफ़ा

कभी भी मोहब्बत में रंगे दो अल्लहड़ों को देखता है तो झल्ला जाता है !
दिल का बचपना जाता ही नहीं और,
कभी कभी तैश भी नादान हो जाता है !!

मोहब्बत को सुनहरे लिफाफे में डाल के उसने शगुन में दे दिया था !
प्रेम कम या ज़्यादा नहीं होता वक़्त के साथ,
या तो परवान चढ़ जाता है या कुर्बान हो जाता है !!