हर शै निस्सार होती है आदमी के कदमो पे,
आदमी बस गुरूर को नहीं जीत पाता!
सावन की बूँदें आंसुओ को छुपा लेती हैं,
वरना वो फखर का मारा रो भी नहीं पाता!!
the pursuit of reason... the fight with self...
हर शै निस्सार होती है आदमी के कदमो पे,
आदमी बस गुरूर को नहीं जीत पाता!
सावन की बूँदें आंसुओ को छुपा लेती हैं,
वरना वो फखर का मारा रो भी नहीं पाता!!
Posted by Sukesh Kumar Monday, 3 May 2010 at 18:32 0 comments
Labels: मेरा जीवन-मेरी कविता (My Life-My Verse)
मदहोश रह के ही सही, ज़िंदगी को बहुत करीब से देखा है!
खुदा को तो नहीं देखा पर सिकंदर को मुक्कदर से हारते देखा है!!
के नसीब से लड़ने वालो को ठोकरों से दोस्ती करते देखा है!!!
Posted by Sukesh Kumar Wednesday, 28 April 2010 at 15:34 0 comments
Labels: मेरा जीवन-मेरी कविता (My Life-My Verse)
| 2009-10 | |
|---|---|
| 0 to 1,60,000 | No tax |
| 1,60,001 to 3,00,000 | 10% |
| 3,00,001 to 5,00,000 | 20% |
| Above 5,00,000 | 30% |
| 2010-11 | |
|---|---|
| 0 to 1,60,000 | No tax |
| 1,60,001 to 5,00,000 | 10% |
| 5,00,001 to 8,00,000 | 20% |
| Above 8,00,000 | 30% |
Posted by Sukesh Kumar Friday, 26 February 2010 at 15:09 2 comments
Labels: Economics, India, Politics
अगर आपने यह गीत पहेले नहीं सुना हुआ तो ज़रूर सुनिए| रोज़ रोज़ ऐसे गीत नहीं बनते जो देश की नीह को हिला के रख दे| अगर आपको गीत के बोल समझ नहीं आ रहे या अर्थ नहीं समझ आ रहा तो यहाँ पे आपको तथ्य मिल सकते हैं|
तेरी आखें
आखो का दिल से कैसा नाता है यह...
निगाहे कोई झुकती हैं तो हसरतें बिखर जाती हैं!
दिल्लगी करती है ज़ुबान से फिर यह...
जो उठ जाती हैं तो ज़ुबान सिमट जाती है!!
मेरी आखें
आखो का दिल से कैसा नाता है यह...
नज़रें गिरती हैं रुखसार पे, तो हसरतें बिखर जाती हैं!
दिल्लगी करती है ज़ुबान से फिर यह...
की खुद तो नज़्म गा जाती हैं, ज़ुबान सिमट जाती है!!
Posted by Sukesh Kumar Tuesday, 19 January 2010 at 13:34 1 comments
Labels: मेरा जीवन-मेरी कविता (My Life-My Verse)

Listening to a song like this, makes you actually realise what 'spell bounding' does mean...
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1.
कोई और वक्त हो, कोई और दिन हो, तो मिट भी जाएँगे
तुम्हारे एक इशारे पे
पर आज हाथ थाम लो, और समेट लो बाहों में
आज मेरी हवस है किनारे पे
2.
अश्कों को आज पोछ दो, यह मेरी वफ़ा के टुकड़े हैं
चुभ गए तो, दाग ही लगाएँगे, दामन सारे पे
Posted by Sukesh Kumar Friday, 11 September 2009 at 15:39 1 comments
Labels: मेरा जीवन-मेरी कविता (My Life-My Verse)